Friday, February 25, 2011

पलकों पे फ़िसलन

मेरी पलकों के किनारे-किनारे
       पांव ज़रा जमा-जमा के रखना
देखो कहीं तुम गिर ना जाना
      
       मेरी पलकों पे फ़िसलन रहती है
पुरानी यादों की काई जमी है
       और पानी भी तो ख़ूब बरसा था
चलो अच्छा ही हुआ
       उन दिनों तुम इधर नहीं आईं
तुम आतीं तो डूब गई होतीं

Thursday, February 24, 2011

औरत जैसा प्रेमी

उसका जब किसी से मन लगा
         तब मरने से उसको डर लगा
पहले वो डरता ही कहां था
         तब प्रेम करता ही कहां था
पहले तो बेख़ौफ़ था वो
          पर तब प्रेमी कहां था वो
बेख़ौफ़ तो बेशक था वो
         पर खुश तो नहीं था तब
अब वो डरता बहुत है
         पर खुश लगता बहुत है
पहले तो रोता भी नहीं था
         अब तो अक्सर  रो लेता है
छी..! औरतों के जैसे
         क्या रोना औरत होना है
तो क्या
        औरत हो गया है वो
या औरत के जैसा
         हां, प्रेम में औरत
या औरत जैसा प्रेमी
        तो अब
वो डरपोक है
        एक औरत की तरह
वो अब प्रेमी है
        एक औरत की तरह

चलो डूब के देखें

चलो प्यार में डूब के देखते हैं
       नहीं, चलो ऐसा करते हैं
डूबूंगा सिर्फ़ मैं
       तुम किनारे पे रहना
और देखती रहना
       कि मैं डूबा कैसे
फिर नीचे अतल गहराई में
      मैं इंतज़ार करुंगा
जब तुम भी डूबोगी
     और डूबकर नीचे पहुंचोगी